पतझड़ एक ख़ामोशी-29-Oct-2025
पतझड़ एक ख़ामोशी
पतझड़ एक "एहस़ास "जुदाई की!
अपनों से संग छुटने,मोह टुटने का वो अकेलापन से
भरा पल तन्हाई का! पतझड़ कहलायी।
'पतझड़ ऋतु 'की एक रीत है पुरानी!
ये जब भी आयी संग अपने" बिछुड़न "
का दर्द ' उपहार 'साथ लायी!
हवाओं में है एक गीत 'ख़ामोशी 'की!
वीरान पड़ी है 'फिज़ा' दिशाओं में!
छायी बहारों में गहरी उदासी निरमोही, निर्दयी
'पतझड़'जो आई।
खाली खाली सी है ये जहां ----!
सुन्ना पड़ा है फूल ,भंवरों ,रंग -बिरंगी तितलियों
से सजी , नन्ही परिंदों की मधुर आवाज़ों से।
गुंजती धरती फूलों का बसेरा,मधुवों का डेरा।
एक एक कर के साथ छोड़ रही पत्तियां!
खड़ खड़ कर के गिर रही पत्तियां!
अब होने लगीं जुदा पेड़ों से !होके मौन बनके ठूंठ खड़ी है वृक्ष। नयनों में नीर की धरा लिए!
वियोग के दर्द में व्याकुल आंखों से बह रही लोर
भींग रही सुखी धरती।
शोक सागर की लहरों में ले रही डुबकियां
मुरझाईं पत्तियां खोके! अपनी वज़ूद,अपनी
अस्मिता। पेड़ -पत्तों का सदियों पुराना
छुटा संग -------! तन्हाई में बीते पल।
एक क्षण ज़रा रुक कर !थोड़ा झुक कर सोच लेते हैं।
न आती पतझड़ की ऋतु तो !होती न मुलाकातें बसंत बहारों से ,पुलकित होती शाखाओं से! कोयल की मिट्ठी गीतों से!
पतझड़ का आना अनिवार्य है ,एक नई शुभारंभ के लिए!
है ज़रुरी पतझड़ ! पहली शुरुआत के लिए।